class 10 science chapter 1 rbsc / भोजन एव मानव स्वास्थ्य

क्लास 10 साइंस चैप्टर 1 

                भोजन एव मानव स्वास्थ्य 

                   (Food and Human Health)

class 10 chapter 1
class 10 chapter 1


पोषण जीवन का आधार है पोषण के रुप में जीव               
अपनेवातावरण से विभिन्न पदार्थ प्राप्त करता है।
 ये पदार्थ पाचन क्रिया के माध्यम से जीव के 
शरीर का अंग बन कर शरीर की विभिन्न 
आवश्यकताओं की पूर्ति करते है।  अच्छे 
स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार लेने की जरुरत है।
 सन्तुलित आहार शरीर को मजबूत बनाता है तथा 
रोगों से लड़ने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता को 
बढाता है, साथ ही संतुलित आहार दिमाग को 
तेज तथा स्वस्थ बनाता है। स्वस्थ भोजन 
के अभाव में थकान और अन्य कई प्रकार
 के रोग हो सकते है। अनुभवों के आधार पर 
यह तथ्य ठीक तरह से जान लिया गया 
है कि जीवन के संचालन हेतु कार्बोहाइड्रेट, 
प्रोटीन,वसा, खनिज-लवण, विटामिन 
तथा जल उचित मात्रा में उपलब्ध हो। 
संतुलित भोजन वह है जिसमें सभी 
आवश्यक पोषक उपलब्ध हो। किसी 
भी पोषक की भोजन में कमी या अनुपलब्धता 
से भोजन असंतुलित होगा। लम्बे समय 
तक जब पोषण में किसी एक या अधिक 
पोषक तत्व की कमी हो तो उसेकुपोषण कहते है।
 कुपोषण का शरीर पर असर कई प्रकार से
देखने को मिलता है। पोषण के विभिन्न 
तत्त्व  विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति 
करते है। अतः स्पष्ट है कि जिस तत्व
 की कमी होगी उसके द्वारा 
किया जाने वाला कार्य नहीं होगा।

 सन्तुलित व असंतुलित भोजन

(Balance and unbalance food)

हमारे देश में कुपोषण का एक बड़ा कारण 
लोगों को सभी पोषक तत्वों से युक्त
संतुलित भोजन पर्याप्त मात्रा में नहीं
मिलना है। मगर कई उदाहरण 
ऐसे भी आते है कि बुरी आदतों
के कारण संतुलित भोजन का 
उचित उपयोग नहीं हो पाता और
व्यक्ति कुपोषण के लक्षण प्रदर्शित 
करने लगता है। कुपोषण का
प्रभाव शारीरिक एवं मानसिक दोनों 
प्रकार की दुर्बलताओं के रुप में प्रकट
होता है। यहाँ हम कुपोषण के कुछ
 प्रमुख प्रभावों की चर्चा करेंगे।

विटामिन कुपोषण

 (Vitamin malnutrition)

विटामिन भोजन का सूक्ष्म भाग होते हैं मगर 
कार्य कीदृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं किसी
एक या अधिक  विटामिन कीकमी होने
पर उसके लक्षण स्पष्ट नजर आते हैं। 

 प्रोटीन कुपोषण 

(Protein malnutrition)

गरीबी के कारण लोग भोजन में प्रोटीन 
पर्याप्त मात्रा में सम्मिलितनही
 कर पाते है और कुपोषण काशिकार 
हो जाते है। मुख्यतः  छोटे बच्चे 
इससे प्रभावित होते है, गर्भवती 
महिलाओं और किशोरावस्था में प्रोटीन
आवश्यक पोषक है। प्रोटीन की कमी से 
क्वाशिओरकोर (Kwashiorkor) रोग 
हो जाता है बच्चे का पेट फूल जाता है
उसे भूख कम लगती है, स्वभाव 
चिड़-चिडा हो जाता है, त्वचा पीली, 
शुष्क, काली, धब्बेदारहोकर फटने लगती है।
 जब प्रोटीन के साथ पोषण मेंपर्याप्त 
ऊर्जा की कमी होती है तो शरीर सूख 
कर दुर्बल होजाता है आँखे कांतिहीन एवम् 
अन्दर धंस जाती है इसस्थिति को मेरस्मस रोग 
(Marasmus) कहते है।

 खनिज कुपोषण

 (Mineral malnutrition)

विभिन्न प्रकार के खनिज भी शरीर 
संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाते है तथा इनकी कमी से शरीर 
में कई प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं। 
लौह तत्व रुधिर के हिमोग्लोबिन का भाग
होता है इसकी कमी से रक्त हीनता के 
कारण चेहरा पीला पड़ जाता है, 
कैल्शियम हड्डियों को मजबूत बनाता है 
इसकी कमी से हडिड्याँ कमजोर व भंगुर 
प्रकृति की हो जाती है, आयोडीन,
की कमी से थायराइड ग्रंथि की 
क्रिया मंद पड़ जाती है।
गलगंड (घंघा) रोग हो जाता है।

 पीने योग्य पानी के गुण व दूषित पानी के दुष्प्रभाव 

(Properties of Drinking water andharmful 

effects of polluted water)

हम इन्सान इतने कम उपलब्ध जल के 
स्त्रोंतों का इस तरह से दोहन कर रहे है
 कि जल्द ही हमारे सामने जल संकट अपने
विकराल रूप में मौजूद होगा। हमारे 
उपयोग का लगभग सारा जल नदियों, झीलों
 या भूमिगत स्त्रोतों से आता है। हम
जल के उपयोग के साथ उसे प्रदूषित 
भी करते है, इस तरह हम द्विधारी 
तलवार से अपने जीवनदाता पर वार कर रहे है।
जल की उपयोगिता की चर्चा करना व्यर्थ है यदि
 कहूँ कि "जल ही जीवन' है तो अतिश्योक्ति
 नहीं होगी। जल का उपयोग पीने, भोजन बनान
, नहाने, बर्तन व कपड़े धोने, कृषि
व उद्योगों में किया जाता है। जल पृथ्वी 
पर पाई जाने वाली एक मात्र ऐसी चीज है
जो पदार्थ की तीनों अवस्था, ठोस
(बर्फ), तरल (जल) और गैस (जलवाष्प) 
रुपों में एक साथ प्राकृतिक तौर पर मौजूद है।
 जो जल हमें मिलता है, उसमें
कई तरह के कण व सूक्ष्म जीव होते है 
उनमें से कुछ हमें फायदा पहुंचाते है तो कुछ
 हमारा नुकसान भी करते है।

पीने योग्य जल में निम्न 

गुण होने चाहिए-

जल में आँखों से दिखने वाले कण 
और वनस्पति नहीं हो, हानि पहुँचाने 
वाले सूक्ष्म जीव नहीं हो, जल का pH
संतुलित हो, जल में पर्याप्त मात्रा में 
ऑक्सीजन घुली हो। हमारा शरीर कई 
तरह की जिम्मेदारियाँ निभाता है जल इस
काम में शरीर की मदद करता है शरीर की 
समस्त उपापचयी क्रियाएँ जल के द्वारा ही
सम्पादित होती है। इसलिए डॉक्टर
भी अक्सर मशवरा देता है कि एक दिन
 में कम से कम 8 गिलास पानी पीना चाहिए। 
यदि आप शारीरिक श्रम ज्यादा करते हो तो 
आपको ज्यादा मात्रा में पानी पीना चाहिए। सही
मात्रा में पानी पीने से शरीर का उपापचय 
सही तरीके से काम करता है। प्रत्येक दिन 8-10 
गिलास पानी पीने से शरीर में - रहने वाले जहरीले
पदार्थ बाहर निकल जाते है, जिससे शरीर
रोग मुक्त रहता है, शरीर में पर्याप्त मात्रा में
 पानी रहने से शरीर में चुस्ती और ऊर्जा बनी रहती है,
थकान का अहसास नहीं होता है। पानी से शरीर
में रेशो (फाइबर) की पर्याप्त मात्रा कायम रहती है,
जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती
है और बीमारियाँ होने का खतरा कम रहता है।
 प्रचूर मात्रा में पानी पीने से शरीर में अनावश्यक 
चर्बी जमा नहीं होती है, उचित मात्रा में पानी 
पीने से शरीर में किसी प्रकार की एलर्जी
होने की आशंका कम हो जाती है, साथ ही फेफड़ो 
में संक्रमण, अस्थमा और आंत की बीमारियाँ
आदि भी नहीं होती है। नियमित भरपूर पानी
पीने से पथरी होने का खतरा भी टला
रहता है, पर्याप्त मात्रा में पानी पीने वाले को 
सर्दी जुकाम जैसेरोग नहीं घेरते है।

दूषित जल के दुष्प्रभाव इस प्रकार हैं-

यदि पीने का पानी दूषित है तो कई बीमारियाँ 
चपेट में ले सकती है। ये बीमारियाँ पानी
 में रहने वाले रोग कारक सूक्ष्म
जीवों के कारण होती है जो पानी के 
साथ शरीर में प्रवेश कर जाते है जिनमें 
विषाणु, जीवाणु, प्रोटोजोआ, कृमि आदि प्रमुख
है। जिनकी वजह से हैजा, पेचिस जैसी 
बीमारियाँ आसानी से किसी को भी शिकार
बना सकती हैं। गंदे पानी से कई प्रकार
की संक्रामक बीमारियाँ फैलती है। गंदे
 पानी से वायरल संक्रमण भी हो सकता है।
 वायरल संक्रमण के कारण हिपेटाइटिस, फ्लू,
कोलेरा, टायफाइड और पीलिया जैसी 
खतरनाक बीमारियाँ होती है। बाला या नारु रोग 
एक समय राजस्थान में गंभीर
समस्या थी। इसका रोगजनक ड्रेकनकुलस 
मेडीनेंसिस नामक कृमि है, इसकी मादा कृमि
 अपने अंडे सदैव परपोषी (मनुष्य) केशरीर के 
बाहर जल में देती है, ऐसे संदूषित जल के 
उपयोग से यह रोग दूसरे लोगों में भी फैल जाता है।
 नारु उन्मूलन कार्यक्रम के प्रयासो से सन् 2000 के 
पश्चात् इसका कोई रोगी नहीं पाया गया 
परन्तु फिर भी इस रोग के पुनः उद्भवन को
रोकनें एवं जल-जनित रोगों से बचाव हेतु 
पानी को छानकर, उबालकर एवं ठंडा कर पीना चाहिए।
नदी, तालाब इत्यादि में नहाना एवं कपड़े धोना
मना हो एवं समय-समय पर इनकी
सफाई होनी चाहिए क्योकि 
स्वच्छ जल है तो स्वस्थ कल है'

मोटापा 

(Obesity)

मोटापा वो स्थिति होती है जब अत्यधिक 
शारीरिक वसा शरीर पर इस सीमा
तक एकत्रित हो जाती है कि वह स्वास्थ्य
पर हानिकारक प्रभाव डालने लगत  है। 
यह संभावित आयु को घटा सकता है। 
शरीर भार सूचकांक (Body mass
index:BMI) मानव भार व लम्बाई 
का अनुपात होता है। जब
25 किग्रा /मी के बीच हो तब 
मोटापा पूर्व स्थिति और जब ये
30 किग्रा/मी. से अधिक हो तब 
मोटापा होता है। मोटापा बहुत से रोगों 
से जुड़ा है जैसे हृदय रोग,
मधुमेह, निद्राकालिन श्वास समस्या,
 कई प्रकार के कैंसर
और अस्थिसंध्यार्थी ।

 मोटापे के कई कारण हो सकते है

 इनमें से प्रमुख है-

मोटापा और शरीर का वजन बढ़ना, ऊर्जा 
के सेवन और ऊर्जा के उपयोग के बीच 
अंसतुलन के कारण होता है। अधिक चर्बी
युक्त भोजन करना, जंक फूड व कृत्रिम
भोजन करना, कम व्यायाम और स्थिर
जीवनयापन, शारीरिक क्रियाओं के सहीं
ढंग से नहीं होने पर भी शरीर पर चर्बी 
जमा होने लगती है, अवटु अल्पक्रियता 
(हाइपोथाईरायडिज्म) आदि।

 रक्तचाप

 (Blood pressure)

रक्तवाहिनियों में बहते रक्त द्वारा वाहिनियों
की दीवारों पर
 डाले गए दबाव को रक्तचाप कहते है। 
धमनियाँ वह नलिकाएँ है 
जो हृदय से रक्त को शरीर के सभी ऊतकों 
और अंगों तक ले जाती है। किसी व्यक्ति का 
रक्तचाप सिस्टोलिक डायास्टोलिक
 रक्तचाप के रुप में अभिव्यक्त किया जाता है 
जैसे 120/80, सिस्टोलिक अर्थात ऊपर की संख्या :
मनियों के दाब को दर्शाती है
 इसमें हृदय की मासंपेशियाँसंकुचित होकर 
धमनियों में रक्त को पम्प करती है, 
डायास्टोलिकरक्तचाप अर्थात नीचे वाली 
संख्या धमनियों में उस दाब कोदर्शाती है 
जब संकुचन के बाद 
हृदय की मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती है।

रक्तचाप का लेवल 

एक सामान्य व्यक्ति का सिस्टोलिक रक्तचाप 
पारा के 90 और 120 मिलीमीटर के बीच तथा 
डायास्टोलिक रक्तचाप
पारा के 60-80 मिलीमीटर के बीच होता है, 
रक्तचाप को मापने  वाले यंत्र को 
रक्तचापमापी कहते है 

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